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Sunday, September 2, 2012

भारत की वास्तु कला


भाषा, भोजन, भेष और भवन देश की संस्कृति के प्रतीक माने जाते हैं। हमारे हिन्दू पूर्वजों ने त्रेता युग में समुद्र पर पुल बाँधा था, महाभारत काल में लाक्षा ग्रह का निर्माण किया था, पाटली पुत्र से ले कर तक्षशिला तक भव्य राज मार्ग का निर्माण कर दिखाया और विश्व के प्राचीनत्म व्यवस्थित नगरों को बसाया था, लेकिन आज उन्हीं के देश में विश्व की अन्दर अपनी पहचान के लिये प्राचीन इमारत केवल ताजमहल है जिस में मुमताज़ महल और शाहजहाँ की हड्डियाँ दफन हैं। हमारे सभी प्राचीन हिन्दू स्मार्क या तो ध्वस्त कर दिये गये हैं या उन की मौलिक पहचान नष्ट हो चुकी है। अधिकाँश इमारतों के साथ जुडे गौरवमय इतिहास की गाथायें भी विवादस्पद बनी हुई हैं। हमारा अतीत उपेक्षित हो रहा हैं परन्तु हम धर्म-निर्पेक्ष बनने के साथ साथ अब शर्म-निर्पेक्ष भी हो चुके हैं।
वास्तु शास्त्र
वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन आरोग्यदायक, आर्थिक दृष्टी से सम्पन्नयुक्त, आध्यात्मिक विकास के लिये  प्राकृति के अनुकूल, और सामाजिक दृष्टी से बाधा रहित होने चाहियें। तकनीक, कलाकृति तथा वैज्ञानिक दृष्टि से भारत की निर्माण कला का आदि ग्रन्थ ‘वास्तु-शास्त्र’ है जिसे मय दानव ने रचा था। रावण की स्वर्णमयी लंकापुरी का निर्माण मय दानव ने किया था। नगर स्थापित्य, विस्तार, रूपरेखा तथा भवन निर्माण के बारे में वास्तु शास्त्र में चर्चित जानकारी आज भी वैज्ञानिक दृष्टि से प्रासंगिक है। इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज के ‘वैज्ञानिक-युग’ में भी भारत के बाहर रहने वाले हिन्दू आज भी अपने घरों, कर्म-शालाओं, दफतरों आदि को वास्तु शास्त्र के अनुकूल बनवाते हैं और भारी खर्चा कर के उन में परिवर्तित करवाते हैं।
सिन्धु घाटी सभ्यता
जब विश्व में अन्य स्थानों पर मानव गुफाओं में सिर छिपाते थे तब विश्व में आधुनिक रहवास और नगर प्रबन्ध का प्रमाण  सिन्धु घाटी सभ्यता स्थल से मिलता है। वहाँ के अवशेषों से प्रमाणित होता है कि भारतीय नगर व्यवस्था पूर्णत्या विकसित थी। नगरों के भीतर शौचालयों की व्यव्स्था थी और निकास के बन्दोबस्त भी थे। भूतल पर बने स्नानागारों में भट्टियों में सेंकी गयी पक्की मिट्टी के पाईप नलियों के तौर पर प्रयोग किये जाते थे। नालियाँ 7-10 फुट चौडी और धरती से दो फुट अन्दर बनी थीं। चौडी गलियाँ और समकोण पर चौराहे नगर की विशेषता थे। घरों के मुख्य भवन नगर की चार दिवारी के अन्दर सुरक्षित थे। इन के अतिरिक्त नगर में पानी की बावडी और नहाने के लिये सामूहिक स्नान स्थल भी था। सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेष हडप्पा और अन्य स्थानों पर मिले हैं परन्तु संसार के प्राचीनतम् नगर काशी, प्रयाग, अयोध्या, मथुरा, कशयपपुर (मुलतान), पाटलीपुत्र, कालिंग आदि पूर्णत्या विकसित महा नगर थे।
कृषि का विकास ईसा से 4500 वर्ष पूर्व सिन्धु घाटी में हुआ था। ईसा से 3000 वर्ष पूर्व सिंचाई तथा जल संग्रह की उत्तम व्यवस्था के अवशेष गिरनार में देखे जा सकते हैं। कृषि के लिये सर्वप्रथम जल संग्रह बाँध सौराष्ट्र में बना था जिसे शक महाराज रुद्रामणि प्रथम ने ईसा से 150 वर्ष पूर्व बनवाया था। पश्चात चन्द्रगुप्त मौर्य ने इस के साथ रैवाटिका पहाडी पर सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था। 
मोइनजोदाडो नगर में ऐक विस्तरित स्नान स्थल था जिस में जल रिसाव रोकने के पर्याप्त बन्दोबस्त थे। स्थल ऐक कूऐं से जुडा था जहाँ से जल का भराव होता था। निकास के लिये पक्की ईंटों की नाली था। नीचे उतरने कि लिये सीढियाँ थीं, परकोटे के चारों ओर वस्त्र बदलने के लिये कमरे बने थे और ऊपरी तल पर जाने कि लिये सीढियाँ बनाई गयीं थीं। लगभल सात सौ कूऐँ मोइनजोदाडो नगर की जल आपूर्ति करते थे और प्रत्येक घर जल निकास व्यव्स्था से जुडा हुआ था। नगर में ऐक आनाज भण्डार भी था। समस्त प्रबन्ध प्रभावशाली तथा नगर के केन्द्रीय संस्थान के आधीन क्रियात्मक था। मनुस्मृति में स्थानिय सार्वजनिक स्थलों की देख रेख के बारे में पर्याप्त उल्लेख हैं। यहाँ कहना भी प्रसंगिक होगा कि जिस प्रकार बन्दी मजदूरों पर कोडे बरसा कर भव्य इमारतों का निर्माण विदेशों में किया गया था वैसा कुकर्म भारत के किसी भवन-निर्माण के साथ जुडा हुआ नहीं है।
मौर्य काल
मौर्य कालीन वास्तु कला काष्ट के माध्यम पर रची गयी है। लकडी को पालिश करने की कला इतनी विकसित थी कि उस की चमक में अपना चेहरा देखा जा सकता था। चन्द्रगुप्त मौर्य ने काष्ट के कई भवन, महल और भव्य स्थल बनवाये थे। उस ने बिहार में गंगा के किनारे ऐक दुर्ग 14.48 किलोमीटर लम्बा, और 2.41 किलोमीटर चौडा था। किन्तु आज किले के केवल कुछ शहतीर ही अवशेष स्वरूप बचे हैं। 
ईसा से 3 शताब्दी पूर्व सम्राट अशोक ने प्रस्तर के माध्यम से अपनी कलात्मिक पसन्द को प्रगट किया था। उन के काल की पत्थर में तराशे स्तम्भ, जालियाँ, स्तूप, सिंहासन तथा अन्य प्रतिमायें उन के काल की विस्तरित वास्तुकला के प्रमाण स्वरूप भारत में कई स्थलों पर खडे हैं।  छोटी से छोटी कला कृतियों पर सुन्दरता से पालिश करी गयी है और वह दर्पण की तरह चमकती हैं।
सारनाथ स्तम्भ अशोक काल की उत्कर्श उपलब्द्धि है। अशोक ने कई महलों का निर्माण भी करवाया किन्तु उन में अधिकतर ध्वस्त हो चुके हैं। अशोक का पाटलीपुत्र स्थित महल विशिष्ट था। उस के चारों ओर ऊची ईँट की दीवार थी तथा सब से अधिक भव्य 76.2 मीटर ऊंचा तिमंजिला महल था। इस महल से प्रभावित चीनी यात्री फाह्यान ने कहा था कि इसे तो देवताओं ने ही बनाया होगा क्यों कि ऐसी पच्चीकारी कोई मानव हाथ नहीं कर सकता। अशोक के समय से ही बुद्ध-शैली की वास्तु कला का प्रचार आरम्भ हुआ।  
गुप्त काल
गुप्त काल को भारत का सु्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल में एलोरा तथा अजन्ता गुफाओं का भव्य चित्रों का निर्माण हुआ। एलोरा की विस्तरित गुफाओं के मध्य में स्थित कैलास मन्दिर एक ही चट्टान पर आधारित है। एलिफेन्टा की गुफाओं में ‘त्रिमूर्ति’ की भव्य प्रतिमा तथा विशाल खम्भों के सहारे खडी गुफा की छत के नीचे ब्रह्मा, विष्णु और महेश की विशाल मूर्ति प्राचीन भव्यता का परिचय देती है। इस मन्दिर का मार्ग ऐक ऊचे दूार से है। अतः कितनी मेहनत के साथ चट्टान और मिट्टी के संयोग से कारीगरों ने इस का निर्माण किया हो गा वह स्वयं में आश्चर्यजनक है और आस्था तथा दृढनिश्चय का ज्वलन्त उदाहरण है।
पश्चिमी तट पर काली चट्टान पर बना बुद्ध-मन्दिर प्रथम शताब्दी काल का है। यह मन्दिर दुर्गम चोटी पर निर्मित है तथा इस का मुख दूार अरब सागर की ओर है और दक्षिणी पठार और तटीय घाटी से पृथक है। 
यद्यपि दक्षिण पठार पर निर्मित अधिक्तर मन्दिर मुस्लिम आक्रमणकारियों ने ध्वस्त या कुरूप कर दिये थे परन्तु सौभाग्य से भारत की प्राचीन वास्तु कला की भव्यता और उस के विनाश की कहानी सुनाने के लिये दक्षिण भारत में कुछ मन्दिरों के अवशेष बचे हुये हैं।
मीनाक्षी मन्दिर मदुराई –शिव पार्वती को समर्पित सातवी शताब्दी में निर्मितमीनाक्षी मन्दिरहै जिस का विस्तार 45 ऐकड में फैला हुआ था। इस मन्दिर का वर्गाकारी निर्माण रेखागणित की दृष्टी से अपने आप में ही ऐक अचम्भा है। मन्दिर स्वर्ण तथा रत्नों से सम्पन्न था। इसी मन्दिर में शिव की नटराज मूर्ति स्थित है। दीवारों तथा स्तम्भों पर मूर्तिकला के उत्कर्श नमूने हैं। इसी मन्दिर से जुडा हुआ ऐक सहस्त्र स्तम्भों (वास्तव में 985) का प्रांगण है और प्रत्येक स्तम्भ केवल हाथ से आघात करने पर ही संगीत मयी ध्वनि देकर इस मन्दिर की भव्यता के विनाश की करुणामयी गाथा कहता है। इस को 1310 में सुलतान अल्लाउद्दीन खिलजी के हुक्म से मलिक काफूर ने तुडवा डाला था।
भारत के सूर्य मन्दिर 
भारत में सूर्य को आनादि काल से ही प्रत्यक्ष देवता माना गया है जो विश्व में उर्जा, जीवन, प्रकाश का स्त्रोत्र और जीवन का आधार है। अतः भारत में कई स्थलों पर सूर्य के  भव्य मन्दिर बने हुये थे जिन में मुलतान (पाकिस्तान), मार्तण्ड मन्दिर (कशमीर), कटरामाल (अलमोडा), ओशिया (राजस्थान) मोढेरा (गुजरात), तथा कोणार्क (उडीसा) मुख्य हैं। सभी मन्दिरों में उच्च कोटि की शिल्पकारी तथा सुवर्ण की भव्य मूर्तियाँ थीं और सभी मन्दिर मुस्लिम आक्राँताओं ने लूट कर ध्वस्त कर डाले थे।
  • कोणार्क के भव्य मन्दिर का निर्माण 1278 ईस्वी में हुआ था। मन्दिर सूर्य के 24 पहियों वाले रथ को दर्शाता है जिस में सात घोडे जुते हैं। रथ के पहियों का व्यास 10 फुट का है और प्रत्येक पहिये में 12 कडियाँ हैं जो समय गणना की वैज्ञानिक्ता समेटे हुये हैं। मन्दिर के प्रवेश दूार पर दो सिहं ऐक हाथी का दलन करते दिखाये गये हैं।  ऊपर जाने के लिये सीढियाँ बनायी गयी हैं। मन्दिर के चारं ओर पशु पक्षियों, देवी देवताओं तथा स्त्री पुरुषों की भव्य आकृतियाँ खजुरोहो की भान्ति नक्काशी गयी हैं। मूर्ति स्थापना की विशेषता है कि बाहर से ही सूर्य की किरणेसूर्य देवता की प्रतिमा कोप्रातः, सायं और दोपहर को पूर्णत्या प्रकाशित करती हैं। इस भव्य मन्दिर के अवशेष आज भी अपनी लाचारी बयान कर रहै हैं।
  • मोढेरा सूर्य मन्दिर गुजरात में पशुपवती नदी के तट पर स्थित है जिस की पवित्रता और भव्यता का वर्णन सकन्द पुराण और ब्रह्म पुराण में भी मिलता है। इस स्थान का नाम धर्मारण्य था। रावण वध के पश्चात भगवान राम ने यहाँ पर यज्ञ किया था और कालान्तर 1026 ईस्वी में सोलंकी नरेश भीमदेव प्रथम नें मोढेरा सूर्य मन्दिर का निर्माण करवाया था। मन्दिर में कमल के फूल रूपी विशाल चबूतरे पर सूर्य की ऱथ पर आरूढ सुवर्ण की प्रतिमा थी। मन्दिर परिसर में ऐक विशाल सरोवर तथा 52 स्तम्भों पर टिका ऐक मण्डप था। 52 स्तम्भ वर्ष के सप्ताहों के प्रतीक हैं। स्तम्भों तथा दीवारों पर खुजुरोहो की तरह की आकर्षक शिल्पकला थी। शिल्पकला की सुन्दरता का आँकलन देख कर ही किया जा सकता है। आज यह स्थल भी हिन्दूओं की उपेक्षा का प्रतीक चिन्ह बन कर रह गया है।
  • मुलतान (पाकिस्तान) में भी कभी भव्य सूर्य मन्दिर था। मुलतान विश्व के प्राचीनतम् दस नगरों में से ऐक था जिस का नाम कश्यप ऋषि के नाम से कश्यपपुर था। इस नगर को प्रह्लाद के पिता दैत्य हरिण्यकशिपु ने स्थापित किया था। इसी नगर में हरिण्यकशिपु की बहन होलिका ने प्रह्लाद गोद में बिठा कर उसे जलाने का यत्न किया था परन्तु वह अपनी मृत्यु को प्राप्त हो गयी थी। कश्यपपुर महाभारत काल में त्रिग्रतराज की राजधानी थी जिसे अर्जुन ने परास्त किया था। पश्चात इस नगर का नाम मूल-स्थान पडा और फिर अपभ्रंश हो कर वह मुलतान बन गया। सूर्य के भव्य मन्दिर को महमूद गज़नवी ने ध्वस्त कर दिया था।
भारत से बाहर भी कुछ अवशेष भारतीय वास्तु कला की समृद्धि की दास्तान सुनाने के लिये प्रमाण स्वरूप बच गये थे। अंगकोर (थाईलैण्ड) मन्दिर ऐक विश्व स्तर का आश्चर्य स्वरूप है। भारतीय सभ्यता ने छः शताब्दियों तक ईरान से चीन सागर, साईबेरिया की बर्फानी घाटियों से जावा बोरनियो, और सुमात्रा तक फैलाव किया था और अपनी भव्य वास्तुकला, परम्पराओं, और आस्थाओ से धरती की ऐक चौथाई जनसंख्या को विकसित कर के प्रभावित किया था। 
राजपूत काल
झाँसी तथा ग्वालियार के मध्य स्थित दतिया और ओरछा के राजमहल राजपूत काल के उत्कर्ष नमूने हैं। यह भवन सिंगल यूनिट की तरह हैं जो तत्कालिक मुग़ल परम्परा के प्रतिकूल है। दतिया के नगर में यह भव्य महल प्राचीन काल की भव्यता के साक्षी हैं। महल की प्रत्येक दीवार 100 गज लम्बी चट्टान से सीधी खडी की गयी है। यह निर्णय करना कठिन है कि मानवी कला और प्राकृति के बीच की सीमा कहाँ से आरम्भ और समाप्त होती है। सभी ओर महानता तथा सुदृढता का आभास होता है। क्षतिज पर गुम्बजों की कतार उभर कर इस स्थान के छिपे खजानों के रहिस्यों का प्रमाण देती है। 
ओरछा के समीप खजुरोहो के मन्दिर विश्व से पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये प्रसिद्ध हैं। यह भारत की अध्यात्मिक्ता, भव्यता, तथा विलास्ता के इतिहास के मूक साक्षी हैं। हाल ही में ऐक देश भक्त ने निजि हेलीकोप्टर किराये पर ले कर महरोली स्थित कुतुब मीनार के ऊपर से फोटो लिये थे और उन चित्रों को कई वेबसाईट्स पर प्रसारित किया था। ऊपर से कुतुब मीनार ऐक विकसित तथा खिले हुये कमल की तरह दिखता है जिसे पत्थर में तराशा गया है। उस की वास्तविक परिकल्पना पूर्णत्या हिन्दू चिन्ह की है।
समुद्र पर पुल बाँधने का विचार भारत के लोगों ने उस समय किया जब अन्य देश वासियों को विश्व के मभी महा सागरों का कोई ज्ञान नहीं था।  इस सेतु को अमेरिका ने चित्रों को माध्यम से प्रत्यक्ष भी कर दिखाया है और इस को ऐडमेस-ब्रिज (आदि मानव का पुल) कहा जाता है किन्तु विश्व की प्राचीनत्म धरोहर रामसेतु को भारत के ही कुछ कलंकित नेता घ्वस्त करने के जुगाड कर रहै थे। भारत सरकार में इतनी क्षमता भी नहीं कि जाँच करवा कर कह सके कि राम सेतु मानव निर्मित है य़ा प्रकृतिक। हमारी धर्म-निर्पेक्ष सरकार मुगलकालीन मसजिदों के सौंदर्यकरण पर खर्च कर सकती है लेकिन हिन्दू मन्दिरों पर खर्च करते समय ‘धर्मनिर्पेक्षी-विवशता’ की आड ले लेती है।
 साभार : चाँद शर्मा

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